पुत्रदा एकादशी हिंदू धर्म की एक अत्यंत पवित्र तिथि मानी जाती है। यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख, वंश वृद्धि और पितृ दोष शांति के लिए किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है क्योंकि यह ग्रहों के दोषों को शांत कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।


🔸 पुत्रदा एकादशी क्या है?

पुत्रदा एकादशी पौष मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से निःसंतान दंपत्तियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।


🔸 ज्योतिष शास्त्र में पुत्रदा एकादशी का महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का सीधा संबंध बृहस्पति (गुरु) और पंचम भाव (संतान भाव) से होता है।

ज्योतिषीय लाभ:

  • गुरु ग्रह की कृपा प्राप्त होती है
  • संतान बाधा योग का नाश
  • पितृ दोष और ग्रह दोष शांति
  • कुंडली के पंचम भाव को बल मिलता है
  • विवाह एवं पारिवारिक जीवन में सुख

विशेष रूप से जिन जातकों की कुंडली में संतान योग कमजोर होता है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है।


🔸 पुत्रदा एकादशी व्रत विधि

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  2. भगवान विष्णु की पीले वस्त्रों में पूजा करें
  3. विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें
  4. तुलसी दल अर्पित करें
  5. संतान प्राप्ति हेतु मनोकामना करें
  6. रात्रि जागरण का विशेष महत्व

🔸 पुत्रदा एकादशी पर बनने वाले शुभ योग

  • गुरु पुष्य योग
  • सर्वार्थ सिद्धि योग
  • धर्म कर्म अधिपति योग

इन योगों में किया गया व्रत कई गुना फल देता है।


🔸 पुत्रदा एकादशी के उपाय (Astrological Remedies)

  • पीले वस्त्र धारण करें
  • केले के पेड़ की पूजा करें
  • गुरु मंत्र का जाप करें
  • गाय को चने की दाल खिलाएं

🔸 निष्कर्ष

पुत्रदा एकादशी न केवल धार्मिक बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत शुभ मानी जाती है। यह व्रत जीवन में संतान सुख, पारिवारिक शांति और ग्रह दोषों से मुक्ति प्रदान करता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया व्रत अवश्य फलदायी होता है।

पुत्रदा एकादशी कथा (Putrada Ekadashi Katha)

पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा

प्राचीन काल में भद्रावती नगरी में राजा सुकेतुमान अपनी पत्नी रानी शैब्या के साथ राज्य करते थे। राजा न्यायप्रिय और धर्मात्मा थे, प्रजा सुखी थी, परंतु राजा-रानी को संतान सुख प्राप्त नहीं था। यही उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख था।

राजा को यह चिंता सताने लगी कि संतान के बिना मृत्यु होने पर पितृ लोक की प्राप्ति नहीं होती। इसी शोक में एक दिन राजा वन की ओर निकल पड़े। वहाँ उनकी भेंट महान ऋषि लोमश मुनि से हुई।

ऋषि ने राजा के दुःख का कारण जानकर उन्हें पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी और बताया कि यह पुत्रदा एकादशी कहलाती है। इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर भगवान विष्णु पुत्र रत्न का वरदान देते हैं।

राजा सुकेतुमान ने रानी शैब्या के साथ मिलकर पुत्रदा एकादशी का व्रत पूर्ण नियमों के साथ किया—

  • भगवान विष्णु की पूजा
  • रात्रि जागरण
  • विष्णु मंत्रों का जाप

भगवान विष्णु उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और कुछ समय बाद रानी शैब्या ने एक तेजस्वी और गुणवान पुत्र को जन्म दिया। उसी दिन से यह एकादशी पुत्रदा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।


🌼 कथा से मिलने वाली शिक्षा

  • सच्ची श्रद्धा से असंभव भी संभव हो जाता है
  • एकादशी व्रत पापों का नाश करता है
  • संतान सुख के साथ पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है
  • भगवान विष्णु की भक्ति जीवन को सफल बनाती है

🔱 निष्कर्ष

पुत्रदा एकादशी कथा यह सिखाती है कि धैर्य, विश्वास और भक्ति से भगवान अवश्य कृपा करते हैं। जो भक्त इस व्रत को नियमपूर्वक करते हैं, उन्हें संतान सुख, पारिवारिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।